चन्द्र सिंह "बादळी"

जीवन परिचय

*जन्म -27 अगस्त 1912
*देहांत -14 सितम्बर 1992

Tuesday, February 9, 2010



राजस्थान बा धरा जठै खून सस्तो अर पाणी मूंगो। बात सट्टै जठै सीस देईजै। इसड़ी धरा रो कवि जुद्ध रै जुझारां नै कविता सुणा देवै तो मरियोड़ा तलवार उठा लेवै। सीस कट्यां पछै भी धड़ लड़ै। आ राजस्थानी जोद्धा री कोनी, कविता री ताकत है। जकी धरती पर मरण मंगळ मानीजै बीं धरा पर प्रकृति रै मिस जीवण री कामना करी कवि चंद्रसिंह बिरकाळी। 'लू' अर 'बादळी' बां रा अमर-काव्य। आखी दुनियां में धूम मचाई। कवि जकी भाषा में आ सरजणा करी बा आज ई आपरै मान नै तरसै। तपती धरती मेह सूं सरसै तो भाषा मानता सूं। कविता भाषा नै तोलण वाळी ताकड़ी मानीजै। आज बांचो, कवि चंद्रसिंह बिरकाळी रा रच्या 'लू' काव्य-कृति रा कीं दूहा अर कूंतो आपणी भाषा री ताकत। इण दूहै मांय कवि लूवां सूं अरज करै कै फूलां री नरम-नरम पांखड़्यां है, नरम-नरम-सी ऐ बेलां अर नरम-नरम-सा पत्ता है, आं रो ध्यान राखी। आं पर दया करी।

कोमळ-कोमळ पांखड़्यां, कोमळ-कोमळ पान।
कोमळ-कोमळ बेलड़्यां, राख्यां लूआं ध्यान।।

पण लूवां क्यां री मानै! वा तो वसंत री भरियोड़ी बाड़ी लूट लेवै।

काची कूंपळ फूल फळ, फूटी सा बणराय।
बाड़ी भरी बसंत री, लूटी लूवां आय।।

बेलां री आंख्यां साम्हीं उणरा लाडेसर बेटा फूल झड़-झड़ पड़ै। देख-देख बेलां झुरै। इण दुख में जड़ समेत भुरभुरा जावै।

झट झट आंख्यां देखतां, झड़ झड़ पड़िया फूल।
झुर झुर बेलां सूकियां, भुर भुर गई समूळ।।

बैसाख महीनै में लूवां बाळपणो। इण बाळपणै में ई इत्ती आकरी, तो जेठ महीनो तो लूवां रै जोर-जोबन रो महीनो, उण वगत बचण रा कांई उपाव करस्या!

बाळपणै बैसाख में, तातो इसड़ो ताव।
पूरै जोबन जेठ में लूआं किसो उपाव।।

राजस्थान री तिरसी धरा पर पाणी री तंगी। दूर-दूर सूं चौघड़ भर-भर ऊंठां पर लाद-लाद बठै लावै जठै घर रा तिसाया जीव-जिनावर पाणी नै उडीकै। पाणी नै घी री दांई बरतै, पण फेर ई लातां-लातां ई निवड़ जावै।

भर चौघड़ चालै घरै, जठै तिसाया जीव।
लातां-लातां नीवड़ै, बरतै जळ ज्यूं घीव।।

'लू' कृति में कुल 104 दूहा है। बाकी दूहा भी आपां बांचता रैस्यां।

8 comments:

  1. Bhaaee Sangram Singh ji, Birkali ji par blog bana'r bhoit hi chokho kaam kryo hai. Apne ghani ghani badhaee. Birkali ji ro o' photu merai sathe hai. Aap photu re sathe merai blog ro bhi jikr kar deta to aru choko rhato. apne feru badhaee. Deendayal Sharma, Mob. 0941451666, Blog: www.http://deendayalsharma.blogspot.com, www.http://tabartoli.blogspot.com, www.http://taabartoli.blogspot.com

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  2. मैं बहुत आभारी हूँ श्रद्धेय श्री ओम पुरोहित ’कागद’ का जो उन्होंने बहुत ही बेशकीमती राजस्थानी भाषा की धरोहर ’बिरकाली जी का राजस्थानी सृजन’ सहेजे इस ब्लॉग के बारे में हमें ज्ञान कराया।
    आभारी हूँ श्री संग्राम सिंह जी का जो उन्होंने राजस्थानी भाषा के पुरोधा श्री चन्दसिंह ’बादळी’ के काव्य सृजन को हम तक पहुंचाया। आपके इस प्रयास को सलाम ओर बहुत बहुत बधाई।
    आपके हमेशा आभारी रहेंगे!!

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  3. we are requested to sh. sangram singh that plz remove word verification, so that coments will be given easily..plz

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  4. aaj ghana dina pachhe aadarjog birkaali ji rachnaavaa ne net par padh hivdo het su hulsgyo. bhaai sangraam singh ne bhaai purohit ji ne ghana ghana rang ne lakhdaad ke ve birkaaliji ri rachnaavaa ne net par laayaa. pan keh mukarni raa duha jika in blog me ni hai. mhe aa udeek raakhu ke keh-mukarni ra duhaa bhi bega su bega in blog par mhaare jisa hetaalua ne mile to sone me suhaago husi.

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  5. birkaali ji raa duha me vaa taakat ne sabdaa me vo tej hai ke ve television re live tele cast jyu laage. in blog par jikaa chitraam derijyaa hai ve sagla sovna-manmovna ne opta-fabta laage. ekar feru in saaru aap loga ne ghana-ghana rang ne lakhdaad. aaj surpoor me betha birkaaliji ne ghano harakh veh reyo husi ke aaj un raa laadesar fagat ek click re saage vaare duha su semunde veh sake.

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  6. अरे पुगे-पुगे कुंवर संग्राम सिंह जी ताई म्हारा समचार, के बेगा पढ़न ने मिले रे कह-मुकरनी रा दोहला रे जियो. अरे घडी रे पलक रो नी खटाव. कुंवर saa aaj holi रो teewar के mhane sunana रे duhaa bhaaylaa me रे जियो.

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  7. rajasthani bhasha to nhi aati pr ha thoda smjh skte hai.cotton city channel se BIRKAALI JI pr kai baar suna vishesh kr "BADALI" aaj pdhne ko mila ,is pryaas k liye bhut bhut bdhaai

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  8. नमस्‍कार,

    राजस्‍थान से नित्‍य-प्रति अनेक चिट्ठे (ब्‍लॉग) लिखे जा रहे हैं। हम जैसे अनेक हैं जो उनको पढ़ना चाहते हैं। खासकर चुनिंदा ताजा प्रविष्ठियों को।
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    सादर।

    दुलाराम सहारण
    चूरू-राजस्‍थान
    www.dularam.blogspot.com

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चन्द्र सिंह "बादळी"

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नोहर, राजस्थान, India
आधुनिक कल में प्राकर्तिक काव्य लिखने की परम्परा कु.चन्दरसिंह बिरकाली से शुरू हुई! आपका जन्म सावन सुदी संवत १९६९ विक्रमी २७ अगस्त १९१२ में बिरकाली गाँव में हुआ ! आप "बादली" और 'लू' जैसी मौलिक रचना के साथ 'कहमुकुरनी','सीप','बाल्साद', ;साँझ',(काव्य) और 'दिलीप', 'कालजे री कौर', राजस्थानी निबंध संग्रह, 'मेघदूत', 'चित्रागादा', 'जफरनामो', 'रघुवंश'(अनुदित)रचनाएँ की !आपकी बंसत, डंफर, धोरा,और बाड़ अनछपी रचनाएँ है ! जुनी राजस्थानी साहित्य की रचना में प्रकर्ति काव्य की एक अच्छी परम्परा है लेकिन आधुनिक कल में इसकी शुरुआत कु.चन्दरसिंह की 'बादली' से शुरू हुई !बादली १९४१ में छपी इसमें १३० दोहे है ! इसके दोहे मरुभूमि की वरसाला ऋतु की प्राकतिक छठा का विवेचन करते है !कवि बरसात से पहले की स्थिति का वर्णन 'बादली' में किया है ! ऐसे ही १९५५ में छपी 'लू'में १०४ दोहे है !'लू' में लू का बनाव सृंगार जोग है !कवि राजस्थान के वासी है ! इसलिए उन्हें इस बात का ध्यान है ! कु.चन्दर सिंह मूल रूप से प्रकर्ति के चितेरे कवि है !