चन्द्र सिंह "बादळी"

जीवन परिचय

*जन्म -27 अगस्त 1912
*देहांत -14 सितम्बर 1992

Wednesday, September 14, 2011

स्व .चन्द्र सिंह बादळी स्मृती संस्थान
ग्राम -बिरकाली

संग्राम सिंह बिरकाली
अध्यक्ष

आज दिनांक १४/०९/२०११ को जन कवि श्री चन्द्र सिंह बादळी की १९ वी पुन्य तिथि संजीवनी क्रेडिट को-ओपरेटिव सोसायटी के कार्यालय में क्षेत्रीय अधिकारी रविन्द्र सिंह इन्द्रोई की अध्यक्षता में मनाई गयी | इस अवसर पर मुख्य अतिथि डी ऍम भारद्वाज ने बादळी जी द्वारा रचित बादळी और लू ऋतू काव्य की व्याख्या करते हुए बताया की ये दोनों काव्यकृतीयां राजस्थान की वास्तविक वास्तु स्थिती से अवगत कराती है |श्री क्षेत्रीय अधिकारी ने इस अवसर पर उनके जीवन परिचय पर प्रकाश डाला तथा उनके सदा जीवन उच्च विचार के बारे में बताया | उन्होंने बताया की चंद्र सिंह बिरकाली से घर बसाने के बारे में एक बार पूछा गया था तो उन्होंने उतर दिया कि दो कमरे बादळी और लू आकाश में बनाये है| उनमे वास करूँगा |इस अवसर पर उनके पौत्र संग्राम सिंह बिरकाली भी मौजूद थे | उन्होंने बाते कि आधुनिक राजस्थानी रचनाओ में कदाचित बादळी ही एक ऐसी काव्यकृति है जिसके अब तक नो संस्करण प्रकाशित हो चुके है | बिरकाली जी को काशी की नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा रत्नाकर पुरस्कार प्रदान कर सम्मानित किया गया | इसी पर राष्ट्रीय स्तर का बलदेवदास पदक भी बिरकाली को प्रदान कर सम्मानित किया गया| इस अवसर पर उत्तम सिंह बीकमपुर,उपेंद्र सिंह,बलवीर सिंह गोविन्दसर, जगत सिंह रेडा,महेश सिंह, एवम दीपक सारस्वत मौजूद थे|
श्री बादळी जी को शत शत नमन .............................................

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चन्द्र सिंह "बादळी"

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नोहर, राजस्थान, India
आधुनिक कल में प्राकर्तिक काव्य लिखने की परम्परा कु.चन्दरसिंह बिरकाली से शुरू हुई! आपका जन्म सावन सुदी संवत १९६९ विक्रमी २७ अगस्त १९१२ में बिरकाली गाँव में हुआ ! आप "बादली" और 'लू' जैसी मौलिक रचना के साथ 'कहमुकुरनी','सीप','बाल्साद', ;साँझ',(काव्य) और 'दिलीप', 'कालजे री कौर', राजस्थानी निबंध संग्रह, 'मेघदूत', 'चित्रागादा', 'जफरनामो', 'रघुवंश'(अनुदित)रचनाएँ की !आपकी बंसत, डंफर, धोरा,और बाड़ अनछपी रचनाएँ है ! जुनी राजस्थानी साहित्य की रचना में प्रकर्ति काव्य की एक अच्छी परम्परा है लेकिन आधुनिक कल में इसकी शुरुआत कु.चन्दरसिंह की 'बादली' से शुरू हुई !बादली १९४१ में छपी इसमें १३० दोहे है ! इसके दोहे मरुभूमि की वरसाला ऋतु की प्राकतिक छठा का विवेचन करते है !कवि बरसात से पहले की स्थिति का वर्णन 'बादली' में किया है ! ऐसे ही १९५५ में छपी 'लू'में १०४ दोहे है !'लू' में लू का बनाव सृंगार जोग है !कवि राजस्थान के वासी है ! इसलिए उन्हें इस बात का ध्यान है ! कु.चन्दर सिंह मूल रूप से प्रकर्ति के चितेरे कवि है !